मेरा नाम रजनी है। मेरी देह की आग और मेरी गुफा की प्यास ने कईयों को बेकरार किया है, पर हर कोई तो इस गुफा की गहराई में नहीं उतर सकता। आज मैं आपके लिए अपनी एक ऐसी रात की कहानी लेकर आई हूँ, जो मेरे कॉलेज के दिनों की है—जब मेरी गुफा और खाई की खुदाई ने मुझे आनंद की चरम सीमा तक पहुँचा दिया।
कॉलेज की वो गर्म रातें
परीक्षा का समय था, और मैं हर शाम अपने ट्यूशन टीचर भानु सर के पास पढ़ने जाया करती थी। भानु सर, एक तंदुरुस्त मर्द, जो इस शहर में अकेले रहते थे। उनकी नज़रों में हमेशा एक भूख दिखती थी—वो भूख जो मेरी जवानी को देखकर और तीव्र हो जाती थी। ट्यूशन के बाद, जब घर का काम निपट जाता, वो मेरी गुफा की गहराई नापने में जुट जाते। उनकी उंगलियाँ, उनकी जीभ, और उनका तना हुआ औज़ार मेरी गुफा को हर बार नए सुख की सैर करवाता।
एक शनिवार की रात को हमारा खास प्रोग्राम था। भानु सर ने अपने दोस्त, अरविंद सर को भी बुला लिया। मैंने घर पर बहाना बनाकर रात भर रुकने का इंतज़ाम कर लिया था। रात 11 बजे के आसपास अरविंद सर दो पैकेट लेकर आए—उनके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी, जो मेरी गुफा में आग लगा देती थी।
गुफा और खाई की खुदाई
कमरे में हल्की रोशनी थी, और हवा में कामुकता की महक। भानु सर ने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया, उनकी गर्म साँसें मेरे गले पर महसूस हो रही थीं। अरविंद सर मेरे सामने खड़े थे, उनका औज़ार पहले ही तन चुका था। मैंने उनकी पैंट के बटन खोले, और जैसे ही मैंने उनके मोटे औज़ार को अपने होंठों से छुआ, मेरे मुँह में एक गर्माहट सी दौड़ गई। दूसरी ओर, भानु सर की जीभ मेरी गुफा में गोते लगा रही थी। उनकी जीभ हर बार अंदर-बाहर होती, तो मेरी गुफा की दीवारें सिहर उठतीं। मैं बेकरार हो रही थी। “सर, अब और मत तड़पाओ… मेरी गुफा को खोद डालो,” मैंने सिसकते हुए कहा। अरविंद सर ने हँसते हुए कहा, “रजनी, अभी तो खेल शुरू हुआ है।” उन्होंने अपना औज़ार मेरे मुँह से निकाला और भानु सर ने तुरंत अपना मोटा, तना हुआ औज़ार मेरे होंठों पर रख दिया। मैंने उसे अपने मुँह में लिया, उसकी गर्मी और कठोरता को महसूस करते हुए। उधर, अरविंद सर मेरी गुफा को चूस रहे थे, उनकी जीभ मेरे सबसे संवेदनशील हिस्से को छू रही थी। मेरी गुफा ने एक बार तो रस छोड़ दिया, पर वो रुके नहीं। मेरी सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं।
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दोहरी खुदाई का आनंद
भानु सर बेड पर लेट गए, उनका औज़ार तोप की तरह तना हुआ था। मैं उनकी जांघों के बीच बैठ गई और धीरे-धीरे उनके औज़ार को अपनी गुफा के मुँह पर रखकर नीचे सरकने लगी। जैसे ही वो मेरी गुफा में समाया, मेरे मुँह से एक गहरी सिसकारी निकली। उसी वक्त, अरविंद सर ने पीछे से मेरी खाई को निशाना बनाया। उन्होंने मेरी कमर पकड़ी और एक ही झटके में अपना औज़ार मेरी खाई में डाल दिया। मेरी गुफा और खाई, दोनों एक साथ खुद रही थीं। शुरू में हल्का दर्द हुआ, पर जल्द ही वो दर्द आनंद में बदल गया।
दोनों सर के औज़ार मेरी गुफा और खाई में तेज़ी से अंदर-बाहर हो रहे थे। कमरे में पच-पच की आवाज़ें गूँज रही थीं। मैं सिसक रही थी, “सर… और तेज़… मेरी गुफा फाड़ डालो!” अरविंद सर ने मेरे बाल पकड़े और अपनी गति और तेज़ कर दी। भानु सर ने कहा, “रजनी, आज तेरी गुफा और खाई की ऐसी खुदाई होगी कि तू ज़िंदगी भर याद रखेगी।”
कुछ देर बाद, भानु सर ने सिसकते हुए कहा, “रजनी, मैं झड़ने वाला हूँ!” और उन्होंने मेरी गुफा में अपना गर्म रस छोड़ दिया। अरविंद सर ने मुझे घोड़ी बनाया और अपनी पूरी ताकत से मेरी गुफा को खोदने लगे। मेरी गुफा बार-बार रस छोड़ रही थी, पर अरविंद सर का औज़ार अभी भी अडिग था। आखिरकार, उन्होंने मेरे बाल खींचे और एक ज़ोरदार धक्के के साथ मेरी खाई पर अपना रस छोड़ दिया।
खीरे का खेल
हम तीनों हाँफते हुए बेड पर गिर पड़े। कुछ देर बाद, अरविंद सर रसोई से एक मोटा, ठंडा खीरा लेकर आए। उन्होंने उस पर कुछ तेल लगाया और मेरी गुफा में धीरे-धीरे डालने लगे। खीरे की ठंडक और उसका मोटापन मेरी गुफा को एक अलग ही सुख दे रहा था। मैं सिसक रही थी, मेरी आँखें आनंद से बंद हो रही थीं। भानु सर मेरे संतरों को मसल रहे थे, और अरविंद सर खीरे को मेरी गुफा में अंदर-बाहर कर रहे थे। मैं फिर से गर्म हो गई थी।
इसके बाद, दोनों सर ने एक बार फिर मेरी गुफा और खाई की जमकर खुदाई की। रात भर हमारी सिसकियाँ कमरे में गूँजती रहीं। सुबह होने तक हम तीनों एक-दूसरे से लिपटकर सो गए, मेरे संतरे और गुफा अभी भी उनके स्पर्श की गर्मी महसूस कर रहे थे।