दोस्तों, मेरा नाम काव्या है। मैं अभी 25 साल की हुई हूँ, लेकिन मेरा शरीर देखने में पूरी तरह से जवान औरत जैसा है और मेरी शादी अभी तीन महीने पहले ही हुई है। मेरी हाइट 5.5 फ़ीट से भी अधिक है और मेरे संतरों का साइज़ भी मस्त है, लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह खूबसूरती अब मेरे किसी भी काम की नहीं है। क्योंकि मेरे पति की प्राइवेट जॉब दूसरे स्टेट में लगी हुई है, इसलिए वह शादी के बाद अभी तक घर नहीं आए हैं।
मेरे ससुराल में मेरा 19 साल का देवर, मेरे ससुर जी और उनकी माँ रहती हैं। मेरी सासु माँ का 2 साल पहले देहांत हो गया था, इसीलिए मेरे पति मुझे अपने साथ नहीं ले गए क्योंकि मुझे घर संभालना था। अब मेरी फीलिंग्स समझने वाला यहाँ पर कोई नहीं था। मेरा गर्म खून अंदर से उबल रहा था, जिसे कोई ठंडा करने वाला चाहिए था, लेकिन मेरे पति तो पिछले तीन महीने से अभी तक घर भी नहीं आए थे।
इसीलिए अब मैं काफ़ी बेचैन और प्यासी-जैसी रहने लगी थी। तभी मेरी नज़र मेरे देवर पर गई। उसकी हाइट मुझसे छोटी थी और शरीर भी मुझसे पतला ही था, मगर उसका घोड़ा उसके हिसाब से बहुत बड़ा था। मेरे देवर का नाम पीयूष है और अबकी बार उसने कॉलेज में प्राइवेट एडमिशन करवाया है, इसीलिए इन दिनों वह घर पर ही रहता है। घर पर मैं और मेरे देवर अकेले ही रहते हैं क्योंकि मेरे ससुर जी की माँ बूढ़ी होने के कारण हमेशा अपने कमरे में आराम करती थीं और ससुर जी घर के बाहर वाले कमरे में रहते हैं।
पहले मैं अपने देवर को वैसी नज़रों से नहीं देखती थी, लेकिन जिस दिन से मैंने पीयूष के ‘नाग देवता’ को देखा, उस दिन से मेरी तो नज़रें ही बदल गईं। उस दिन पीयूष को लगा कि घर में कोई नहीं है, इसलिए वह अपने कमरे में वीडियो देखता हुआ ‘नाग देवता’ से खेल रहा था। तभी अचानक मेरा वहाँ से गुज़रना हुआ और मेरी नज़र खिड़की पर पड़ गई। जब मैंने खिड़की में से झाँककर देखा तो मेरे तो होश ही उड़ गए। पिछले तीन महीनों में मैंने पहली बार ‘नाग देवता’ के दर्शन किए।
उस दिन मैंने अपने पति को भी फ़ोन किया कि, “अब आप आ जाइए, मुझसे अब और नहीं रहा जा रहा है। कब तक मैं ऐसे अकेली ही तड़पती रहूँगी?”
तभी मेरे पति ने मुझसे माफ़ी माँगते हुए कहा कि, “देखो काव्या, मैं तुम्हारी बेचैनी समझ सकता हूँ, लेकिन मुझे अगले दो महीने कोई भी छुट्टी नहीं मिलेगी। बस दो महीने और इंतज़ार कर लो, काव्या, फिर तो मैं ले-लेकर तुम्हारा बुरा हाल कर दूँगा।” ऐसा कहकर मुस्कुराते हुए उन्होंने फ़ोन काट दिया।
जैसे-तैसे करके सुबह हो गई। सुबह मैंने सभी के लिए चाय-नाश्ता बनाया और पीयूष के लिए स्पेशल कमरे में लेकर चली गई। जैसे ही मैं पीयूष के कमरे में गई, तो मैंने देखा कि पीयूष अभी तक सो रहा था और सोने की वजह से ‘नाग देवता’ एकदम सीधा खड़ा था। उसे देखकर मुझसे बिल्कुल भी रहा नहीं गया और मैंने उसे छू लिया। ‘नाग देवता’ को छूते ही मेरे शरीर में करंट-सा दौड़ गया, लेकिन तभी मैंने देखा कि पीयूष जग गया है और वह मेरी तरफ़ ही देख रहा है। इसके बाद मैं जल्दी से पीछे हटी और बोली कि, “देवर जी, अब उठ भी जाओ, सुबह हो गई है।”
इसके बाद पीयूष वापस अपने कमरे में आ गया और हम दोनों देवर-भाभी आपस में बातें करते हुए नाश्ता करने लगे। तभी मैंने पेट दर्द का बहाना बनाया और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। पीयूष हड़बड़ाकर पूछने लगा कि, “क्या हुआ भाभी? आप इतनी तकलीफ़ में क्यों लग रही हैं?”
तभी मैंने उसे रोकते हुए कहा कि, “पीयष, पेट दर्द वाली गोली तो मैं कब की ले चुकी हूँ। हो सके तो थोड़ी देर तुम मेरा पेट दबा दो।” पीयूष पहले तो थोड़ा-सा हिचकिचाया, लेकिन मेरे दर्द को देखकर वह बेड पर बैठा और पेट दबाने लगा।
मैं रसोई में पीयूष के लिए रोटियाँ बना रही थी, तभी पीछे से पीयूष रसोई में आ रहा था। मैंने उसे देखकर पहले से ही अपनी साड़ी का पल्लू नीचे डाल दिया। जब पीयूष की नज़र मुझ पर पड़ी तो वह मुझे देखता ही रह गया, क्योंकि मैं पूरी पसीने में भीगी हुई थी। पीयूष को देखने का नाटक करते हुए मैंने नीचे झुकते हुए अपने पल्लू को उठाया तो पीयूष को स्वर्ग के दर्शन भी करा दिए।
आज ससुर जी भी बाज़ार गए हुए थे और दोपहर में दादी-सासू माँ भी गोलियाँ लेकर सो जाती हैं, इसीलिए घर पर मेरे और मेरे देवर के अलावा कोई नहीं था। इसलिए आज मैंने मन में पक्का कर लिया था कि आज तो मैं पीयूष के ‘नाग देवता’ के दर्शन करके ही रहूँगी, लेकिन पीयूष अभी भी मुझे वैसी नज़रों से नहीं देख रहा था।
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शाम को हम दोनों बैठकर खाना खा रहे थे, तभी पीयूष ने मुझे आखिरकार कह ही दिया कि, “भाभी, लगता है आजकल आपकी तबीयत थोड़ी-सी ठीक नहीं है, इसीलिए आप कुछ दिन के लिए भैया के पास शहर ही चली जाइए। यहाँ पर मैं सब सँभाल लूँगा।”
तभी मेरी आँखों में आँसू आ गए और मैंने पीयूष से कहा कि, “बस करो, आप तो रहने ही दो। मैं पिछले दो-तीन महीने से कितना परेशान हूँ, किसी को नहीं पता।” मुझे रोता देख पीयूष मेरे आँसू पोंछने लगा, तभी मैं पीयूष के गले लगकर सिसकने लगी। मैं पीयूष से कहने लगी कि, “देवर जी, मुझे आप में आपके भैया जैसे नज़र आते हैं।”
तभी पीयूष मुझसे कहने लगा कि, “नहीं भाभी, आपकी बातों का मैं क्यों बुरा मानूँगा? आप जैसी भाभी तो किस्मत वालों को ही मिलती है।”
तभी मैंने पीयूष का हाथ पकड़ लिया और उसे सहलाते हुए पूछने लगी कि, “देवर जी, आप मुझसे इतना दूर-दूर क्यों भागते हैं?”
तभी पीयूष मुझसे बोला कि, “नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है। यहाँ तक कि मेरी तो कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं है।”
तो मैंने उसकी गोदी में सिर रखकर उससे कहने लगी कि, “तुम्हारा कोई गर्लफ्रेंड नहीं है तो तुम मुझे बना लो ना, क्यों इतना तड़पा रहे हो।”
आज मेरा इमोशनल होना पीयूष पर थोड़ा भारी पड़ गया था और वह मुझे अपने दिल की सारी बातें बताने लगा। वह भी कहने लगा कि, “भाभी जी, जब मैं आपको देखता हूँ, तो मेरे शरीर में भी करंट-सा दौड़ने लगता है।”
यह सुनकर तो मैं खुश हो गई थी। मैं गोदी से खड़ी होकर बेड पर बैठ गई और पीयूष से कहने लगी कि, “अच्छा बताओ, दूध पियोगे क्या?”
तो पीयूष बोला कि, “अरे भाभी, अभी तो खाना खाया है।”
तभी मैंने कहा, “अरे देवर जी, आप तो अभी बच्चे के बच्चे ही रह गए, मैं वो वाले दूध की बात नहीं कर रही हूँ।” तभी पीयूष का मुँह लाल हो गया।
फिर मैंने कहा कि, “ऐसे शर्माने से बात नहीं बनेगी, देवर जी। अभी आपको ही सब कुछ करना है।”
इतना बात सुनकर तो मैं हँसने लगी और उससे कहने लगी कि, “चिंता मत करो तुम, तुम्हें और मुझे, दोनों को ही बड़ा मज़ा आएगा। चलो, अब जल्दी से तैयार हो जाओ।”
तभी अचानक से घर का दरवाज़ा बजा। मैंने पीयूष से कहा कि, “तुम ज़रा रुको, मैं देखकर आती हूँ कौन है।” जैसे ही मैंने बाहर जाकर दरवाज़ा खोला, तो मैं देखकर हैरान हो गई क्योंकि सामने मेरे पति थे।
तभी मैंने चौंककर कहा, “आप?” तो वह कहने लगे कि, “क्यों, क्या बात हुई मेरी जान, मैं ही हूँ। आज आपके पतिदेव साक्षात प्रकट हुए हैं।” अनिल ने मुझे दरवाज़े से ही गोदी में उठा लिया और कहने लगे कि, “चलो, आज तुम्हें दिन में तारे दिखाता हूँ।”
अनिल पाँच दिन रुके थे और इन पाँच दिनों में उन्होंने मेरा बुरा हाल कर दिया था। देने के बाद मैं ठीक से चल भी नहीं पाती थी। वह दिन में भी और रात में भी, कमरे में भी और यहाँ तक कि बाथरूम में भी लेने लगे थे। अनिल के आने के तीसरे दिन बाद से पीयूष घर में नहीं दिखा। जब मैंने अनिल से पूछा तो उन्होंने बताया कि वह मिलने के लिए अपने मामा के यहाँ चला गया है।
अनिल को गए हुए पूरे 5 दिन बीत चुके थे और पीयूष भी अभी तक नहीं आया था, तो मुझे चिंता होने लगी कि कहीं पीयूष मुझसे नाराज़ तो नहीं हो गया है? इसीलिए मैंने हिम्मत करके उसकी मामी के यहाँ फ़ोन कर लिया और उससे पूछा कि, “क्या हुआ देवर जी, अपनी भाभी से नाराज़ हो गए हो क्या?”
पहले तो पीयूष नहीं माना, लेकिन मैं ज़िद करके आखिर में उसे मना ही लिया कि वह कल ही घर आ जाए।
अगले दिन पीयूष घर आ गया और उसने बस मुझे नमस्ते किया और अपने कमरे में चला गया। उसे मनाने के लिए दोपहर में मैंने उसकी पसंद का सूजी का हलवा बनाया और उसके कमरे में देने को चली गई। मैंने नहाकर लाल रंग की साड़ी पहनी और उसे खुश करने के लिए थोड़ा-सा शृंगार भी कर लिया।
मुझे पता था कि पीयूष मुझसे नाराज़ है, इसीलिए मैंने उसका हाथ पकड़ा और उससे रिक्वेस्ट करने लगी कि, “अब मान भी जाओ देवर जी और कितना सताओगे अपनी भाभी को। अब उस दिन तुम्हारे भैया आ गए तो इसमें मेरा क्या कसूर है?”
तभी पीयूष बोला कि, “नहीं भाभी, वो बात नहीं है। मैंने आपसे पहले भी कहा था कि यह सब गलत है।”
मैंने उसे समझाया, “मैं कौन-सा तुम्हारे भैया को छोड़कर जा रही हूँ? बस इसी बहाने हमारा भी मन लगा रहेगा और तुम्हारे भैया की याद भी नहीं आएगी।”
फिर पीयूष हँसकर बोला कि, “अच्छा, अब हलवा ही खिलाओगी या फिर दूध भी पिलाओगी? उस दिन तो आप बड़ा कह रही थीं कि देवरजी दूध पी लो।”
तभी मैंने पीयूष को चिमटी काटते हुए बोला कि, “दूध तो तुम्हारे भैया पी गए, अब तो तुम्हें इन्हें देखकर ही काम चलाना पड़ेगा,” और ऐसा बोलकर हम दोनों हँसने लगे।
तो पीयूष बोला कि, “भाभी अच्छा, फिर गुब्बारों से ही खेल लेने दो।”
फिर मैं बोली कि, “अरे बाबा, इसमें पूछने वाली कौन-सी बात है? जब मन करे तब खेल लिया करो।”
पीयूष ने अपने जीवन में पहली बार गुब्बारों को छुआ था, तो उसका तो छूते ही छूट गया। मैंने पीयूष को बोला, “क्या हुआ देवर जी?”
तो पीयूष शर्माते हुए बोला कि, “मेरा तो निकल गया भाभी जी।”
इसके बाद हम दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। तभी मैंने कहा कि, “देवर जी, आप तो बहुत नरम निकले।”
इस प्रकार अब पीयूष मेरे साथ बहुत मस्ती करता और मैं भी उसके साथ बहुत मस्ती करती थी। वह मेरे कामों में भी हाथ बँटा देता। अब मैं अनिल को भी घर आने के लिए परेशान नहीं करती थी। पीयूष को दूध पीना बहुत अच्छा लगता था, तो वह दिन में हर वक्त दूध पीने की ज़िद करता रहता। इस प्रकार उसने कभी भी मुझे अनिल की कमी महसूस नहीं होने दी।