मेरा नाम राजू है और मैं अभी 27 साल का हूँ। मेरी हाइट पाँच फ़ीट 11 इंच की है और मैं बिहार से हूँ। आज मैं बात करने जा रहा हूँ एक औरत की ज़रूरतों को पूरा करने की, कि कैसे एक भाभी पूरे होश-ओ-हवास में अपने आप को अपने देवर की बाँहों में सिर्फ़ इसलिए सौंप देती है क्योंकि उसका पति उसे समय नहीं दे पा रहा था।
इस देवर-भाभी कहानी की शुरुआत मेरे चचेरे भाई की शादी से हुई थी। भैया मात्र दसवीं तक पढ़े हैं, इसलिए वे बेंगलुरु में किसी फैक्ट्री में काम करते थे। भाभी मेरी उम्र से 2 साल बड़ी थीं। वे दिखने में ठीक-ठाक थीं, लेकिन मैं शुरू से ही भाभी के इस ठीक-ठाक यौवन के पीछे पागल हो चुका था क्योंकि शादी के एक महीने बाद ही मैंने उन्हें सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में देख लिया था।
उन दिनों जब भाभी नई-नई आई थीं, मैं ज़्यादातर वक्त उनके साथ ही बिताता था। एक दिन भाभी से बात करते-करते मैं उनके रूम में ही सो गया। उस वक्त भाभी नहाकर अपने रूम में कपड़े पहनने आई थीं। जैसे ही भाभी ने रूम का दरवाज़ा ज़ोर से खोला, मेरी नींद खुल चुकी थी, पर मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैं बस हल्के से आँखें खोलकर उस नज़ारे का मज़ा ले रहा था। बाद में जब मैंने यह घटना भाभी को बताई, तो उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें अपनी शादी के वक्त से ही पसंद करती थी। अगर तुम उसी दिन मुझे यह बता देते तो मुझे इतना इंतज़ार नहीं करना पड़ता।”
अब प्वाइंट पर आते हैं। जब मैं भोपाल में इंजीनियरिंग के तीसरे साल में था, तब एक रात भाभी का फ़ोन आया। उस रात हमने 6 घंटे बात की। फिर ऐसे ही रोज़-रोज़ फ़ोन आने लगे। बात करते-करते वह खुलकर अपनी लाइफ़ के बारे में बताने लगीं। मुझे लगा कि वे मज़ाक कर रही हैं, पर मैं तब कन्फर्म हुआ जब उन्होंने सिर्फ़ मुझे चिढ़ाने के लिए अपने ब्लाउज के ऊपर के दो बटन खोलकर उसकी फोटो व्हाट्सएप पर भेजी। यार, कसम से, क्या संतरे थे उनके, एकदम रस से भरे!
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ऐसे ही मस्ती-मज़ाक होते-होते उन्होंने मुझे एक जनवरी को घर आने को कहा। फिर उन्होंने कहा, “अगर तुम दो जनवरी तक घर आ जाते हो तो तुम जो माँगोगे, मैं वह गिफ़्ट तुम्हें दूँगी।” यह सुनकर मैंने कहा, “सोच लो, मैं कुछ भी माँग सकता हूँ।” तो उन्होंने हँसकर फ़ोन काट दिया। मैंने पहले से ही 14 जनवरी का टिकट कराया हुआ था, लेकिन मैंने उसे कैंसिल करके एक जनवरी की सुबह का टिकट ले लिया।
दो तारीख की दोपहर तक मैं अपने घर पहुँच गया। मैं न्यू ईयर विश करने के बहाने उनके घर चला गया। जैसे ही मैं भाभी के सामने गया, वे हैरान होकर मुझे घूरने लगीं। मैंने उनके पास जाकर, उनके कान में धीरे से न्यू ईयर विश किया और उनका वादा याद दिलाया।
मुझे आज भी वह शाम याद है जब बड़ी माँ किसी काम से उसी कमरे में आईं और मुझे देखकर उन्होंने मुझे एक काम सौंपा और चली गईं। माँ के जाने के बाद मैंने भाभी की आँखों में एक अलग-सी प्यास देखी। वे मुझे अजीब तरीके से देख रही थीं, बार-बार मेरे करीब आने की कोशिश कर रही थीं। वे बार-बार अपने जिस्म को मेरे शरीर से रगड़कर आ-जा रही थीं। उनके इस बार-बार के घर्षण से मेरा औजार खड़ा होने लगा था।
जब भाभी ने आखिरी बार अपनी खाई मेरे औजार पर रगड़ी, तो मैंने अपना आपा खो दिया। मैंने उनका हाथ पकड़ा और उनके कान के पास अपने होंठ ले जाकर धीरे से कहा, “ऐसे मुझे क्यों पागल बना रही हो?” यह कहकर मैं उनके कान की लौ को चूसने लगा।
मैंने उन्हें सामने से पकड़ा, उनका चेहरा अपने चेहरे के पास लाकर कहा, “भाभी, मैं तो आपके पीछे पागल हो गया हूँ, आपको प्यार करने के लिए ही भोपाल से यहाँ आया हूँ।”
इतना सुनकर वे मुझसे ऐसे लिपट गईं जैसे चंदन के पेड़ पर साँप लिपटता है। वे मुझसे लिपटकर धीरे से मेरे कान में बोलीं, “देवर जी, मैं भी आपको प्यार करती हूँ, पर शर्म के मारे आज तक बोल नहीं पाई।” वे रोते हुए अपनी राम-कहानी सुनाने लगीं। उन्होंने बताया, “तुम्हारे भैया साल में सिर्फ़ एक महीने के लिए आते हैं, उसी एक महीने में मैं अपना जीवन जीती हूँ और बाकी 11 महीने तड़पकर रह जाती हूँ।”
अगली सुबह जब मैं उठा तो देखा कि भाभी एकदम परी की तरह सजकर मेरे घर किसी काम के बहाने आई हुई थीं। मम्मी ने मुझे भाभी के साथ उनके घर जाकर बिजली का बोर्ड ठीक करने को कहा, जिसे मैं मना नहीं कर पाया। जब मैं भाभी के घर गया तो उन्होंने मेन गेट बंद कर दिया और कल की तरह फिर मुझसे लिपटकर माफ़ी माँगने लगीं।
मैंने उनकी कमर पकड़कर उन्हें अपने करीब खींचा और उनकी आँखों पर एक प्यारा-सा किस किया। वे पूरी तरह मेरी बाँहों में ढीली पड़ गईं और मुझसे लिपटकर पागलों की तरह चूमने लगीं। करीब आधा घंटा तक हम दोनों एक-दूसरे को बाँहों में भरकर किस करते रहे। इस दौरान मेरे हाथ कभी उनके संतरों को छूते, तो कभी उनकी खाई को सहलाते।
देवर-भाभी के कारनामों से वे और गर्म होने लगीं। उनके मुँह से आवाज़ें आने लगीं, जो बता रही थीं कि वे कई दिनों की प्यासी थीं। मैंने ब्लाउज के ऊपर से ही उनके संतरों को मसलना शुरू किया। फिर धीरे-धीरे मेरा एक हाथ उनकी साड़ी के अंदर चला गया और उनकी पैंटी के ऊपर से उनकी गुफा को सहलाने लगा। उनकी गुफा पूरी तरह गीली हो चुकी थी।
मैंने भाभी से उनकी गुफा दिखाने का आग्रह किया। तब भाभी ने कहा, “ऊपर-ऊपर से ही देख लो।” उन्होंने अपनी साड़ी को ऊपर उठा दिया। उन्होंने नीली पैंटी पहनी थी, जो पूरी तरह भीग चुकी थी। मैंने उनकी पैंटी को ज़बरदस्ती उतारकर साइड में फेंक दिया और उनकी साफ़ गुफा को सहलाने लगा। वे आवाज़ करके मुझे गर्म कर रही थीं। मैंने अपनी एक उँगली उनकी गुफा में अंदर तक डालकर अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। उँगली अंदर लेते ही वे इतनी ज़ोर से चीखीं कि उनकी आवाज़ से नीचे से बड़ी माँ ऊपर आ गईं।
जल्दी-जल्दी हम दोनों एक-दूसरे से अलग हुए। मैंने भाभी की पैंटी जल्दी से उठाई और अपने नाड़े में छुपा ली। माँ मुझे बोर्ड बनाते देखकर नीचे चली गईं। तब भाभी ने झट से मुझे अपनी बाँहों में समेट लिया और पागलों की तरह चूमने लगीं। वे ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ भरती हुईं मुझसे लिपटकर प्यार की भीख माँगने लगीं।
मैंने फिर से उनकी गुफा में उँगली डालकर अंदर-बाहर करना शुरू किया। मैंने उनकी गुफा को चूमा और हल्के से जीभ फेरी। भाभी ज़ोर-ज़ोर से सिसकारियाँ लेने लगीं। मैंने अपनी उँगलियों की मदद से उनकी गुफा के फाँकों को फैलाया और उनके दाने को चूसने लगा। माँ कसम, इतना मज़ा तो मुझे पीने में भी नहीं आया था। भाभी पागलों की तरह मचल रही थीं। करीब 15 मिनट की इस गुफा पिलाई में वे तीन बार झड़ चुकी थीं।
अब बारी उनकी थी मुझे ठंडा करने की। मैंने अपना औजार बाहर निकाला। उसे देखकर भाभी बहुत खुश होती हुईं बोलीं, “एक अरसे के बाद मुझे औजार देखने को मिला।” वे तुरंत घुटनों पर बैठकर मेरे औजार को चूसने लगीं। फिर वे मेरे औजार को हाथ से हिलाने लगीं। मेरा औजार पहले से ही खड़ा था और काफ़ी सख्त हो गया था। भाभी ज़ोर-ज़ोर से मेरे औजार को हिलाने लगीं। पहली बार कोई लड़की मेरे औजार को पकड़े हुए थी। करीब 10 मिनट बाद मैं एक ज़ोर की आवाज़ के साथ झड़ गया। मेरे औजार की पिचकारी सीधे उनके मुँह पर गई।
अगले दिन बड़ी मम्मी को किसी मंदिर जाना था और उनके साथ बड़े पापा भी जा रहे थे। उन्होंने भाभी से भी चलने को कहा, पर भाभी ने न आने का बहाना बना दिया और वे घर रुक गईं। उस वक्त मैं उनके घर पर ही था। भाभी ने आँख दबा दी और मैं समझ गया कि आज घपाघप होने का मौका है।
उन सभी के जाने के बाद मैंने दरवाज़े बंद किए और भाभी पर टूट पड़ा। जल्दी ही हम दोनों नंगे हो गए। मैंने भाभी के संतरे चूसते हुए उन्हें चित्त लिटाया और उनकी गुफा में औजार पेल दिया। भाभी की गुफा की फाँकें चिपककर नई गुफा का एहसास दे रही थीं। मैं उन्हें आधा घंटा तक खोदता रहा और उनके पेट पर झड़ गया। भाभी और मैंने उस दिन चार बार खुदाई का मज़ा लिया।