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अदिति की चुदाई स्टोरी

अदिति का नृत्य एक सपना था — जैसे किसी सुनसान बाग़ में अचानक पत्तियों का एक जादुई हिलना शुरू हो जाए। वो नाचती, और उसके पैरों की थापें अपना एक अलग संगीत रचतीं। हर मुद्रा में एक कहानी, एक अनकहा दर्द… और जब वो किसी राग पर थिरकती, तो देखने वाला उसी पल में कैद हो जाता।

वो एक प्रसिद्ध कोरियोग्राफर, प्रतीक की डांस एकेडमी में सिखाती थी। वहाँ उसका काम था शरीर की भाषा से भावनाओं को जन्म देना। पर उसकी प्रतिभा के बावजूद, प्रतीक — उसका बॉस — उसे हमेशा नीचा दिखाता। कभी उसकी एक उंगली का कोण ग़लत हुआ तो ताना, कभी भावुकता ज़रा ज़्यादा हुई तो उपहास और उस एकेडमी में एक और नज़र थी —

कबीर प्रतीक का भाई। एक शांत, गंभीर लेखक। वो अक्सर स्टूडियो में आकर बैठ जाता, कभी किताब पढ़ता, कभी नई कहानी के प्लॉट सोचता। लेकिन उसकी नज़रें हमेशा अदिति पर टिकी रहतीं — जैसे वो उसकी हर हरकत में एक नया वाक्य ढूंढ रहा हो। अदिति का नृत्य जब पूरे हॉल में फैलता, वो अपनी कलम रोक लेता। और जब प्रतीक उसे डांटता देखता, तो उसकी मुट्ठी बेतहाशा भींच जाती।

शहर के एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक समारोह का आयोजन हुआ। एकेडमी का पूरा दल वहाँ था। हजारों की भीड़। मंच पर एक से एक कलाकार। लेकिन जब अदिति स्टेज पर आई — एक साधारण सी नीली साड़ी, बिना किसी गहने के — तो पूरा हॉल स्तब्ध हो गया।वो नाच रही थी एक अकेलेपन के भाव पर… एक ऐसी आत्मा की कहानी जो अपना घर ढूंढ रही है।उसका शरीर स्वयं एक संगीत था दर्द से भरा, कोमल, और अथाह।

तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल काँप उठा। शो के बाद प्रतीक ने उसे ग्रीन रूम में बुलाया। कबीर दरवाज़े पर खड़ा था।

“तू समझती क्या है अपने आप को?” प्रतीक चिल्लाया, “बस एक टीचर है तू। मेरी दया पर पलती है। यहाँ का सबसे बड़ा शो करने का साहस? यह घमंड मत दिखा! अदिति चुप थी। सिर झुकाए। और उसका आत्मविश्वास… टुकड़े-टुकड़े हो रहा था।

कबीर ने एक पल के लिए दीवार पर माथा टेक दिया। उसके जबड़े की मांसपेशियाँ तन गईं।

बाहर ठंडी हवा चल रही थी, पहाड़ों से कोहरा उतर रहा था। अदिति अपनी छोटी सी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। रेलिंग पर झुककर उसने आँखें बंद कर लीं। गालों पर आँसू बह रहे थे — ठंडी हवा से सूख भी रहे थे और नए आ भी रहे थे।

तभी पीछे से दरवाज़ा खुला कबीर अंदर आया। उसके हाथ में दो कप गर्म चाय थी। उसका ऊनी स्वेटर हल्का भीगा हुआ था। उसकी मजबूत भुजाओं का आकार और चौड़े कंधे साफ़ झलक रहे थे।

“तुम्हारे नृत्य ने मेरी कलम को नई स्याही दे दी,” उसने कहा, “और उसने… उसने तुम्हारी आत्मा को रौंद डाला।”अदिति मुस्कुराई, एक खालीपन लिए हुए।

“कभी-कभी लगता है… ये सब छोड़कर चली जाऊँ।” कबीर ने एक कप चाय उसे थमाया। “लेकिन फिर मेरी कहानियों का अंत कौन लिखेगा?” वो दोनो कुछ देर चुप रहे। बालकनी में कोहरा घुल रहा था। चाय की भाप उनके चेहरों से टकरा रही थी। “तुम जब नाचती हो, तो लगता है… मेरे शब्दों को एक शरीर मिल गया है,” कबीर ने कहा।

अदिति उसकी ओर देखती रही — उसकी गहरी, विचारमग्न आँखें, माथे पर पड़ी लकीरें, और होंठों पर एक अधूरा वाक्य। “तुम्हें पता है कबीर,” उसने धीरे से कहा, “तुम जब देखते हो, तब मैं सबसे सच्चा नृत्य करती हूँ।”

कबीर का हाथ अदिति की कलाई पर गया — वही कलाई जो मुद्राओं में कहानियाँ कहती थी।

उसने हल्के से उसे छुआ — जैसे कोई पन्ना पलटते वक्त काग़ज की बनावट महसूस करे।

अदिति ने उसकी उँगलियों में अपनी उँगलियाँ डाल लीं, फिर धीरे-धीरे उसके हाथ के पिछले हिस्से को चूमा।

“अगर उस रात कोई नृत्य होता, तो तुम्हारे स्पर्श की मुद्रा होती…” उसने कहा।

फिर वह उसके चेहरे के करीब आया, और दोनों के होंठों के बीच की दूरी एक साँह में मिट गई। कोई हड़बड़ी नहीं थी। बस धीरे-धीरे — जैसे कोई शब्द काग़ज पर उतर रहा हो।

कबीर ने धीरे से उसके गाल पर हाथ फेरा, और उसकी आँखों के कोने चूमे — पहले एक कोना, फिर दूसरा।

अदिति धीरे-धीरे कबीर के और नज़दीक सरकी — इतनी पास कि उनकी साँसों की गर्मी एक होने लगी। उसकी साड़ी का पल्लू हट गया था, और उसकी गर्दन की रेखाएँ एक अनकहे इतिहास की तरह चमक रही थीं।

कबीर ने उसकी आँखों में देखा — नम, चमकती पलकों के पीछे एक साहसिक कहानी छिपी थी।

उसने अदिति की नाक का ठुड्डा छुआ — फिर होंठों से उसका स्वाद लिया।

वो पहला चुंबन एक कविता की शुरुआत थी, शांत पर गहरी… जैसे किसी महाकाव्य का पहला अक्षर।

उनके होंठ एक-दूसरे को पढ़ने लगे, और वो चुंबन एक लंबी पंक्ति बनती चली गई। फिर कबीर ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया — अब दोनों के दिलों की धड़कनें एक ही पन्ने पर लिखी जा रही थीं।

कुछ देर बाद अदिति का हाथ नीचे सरका — उसने धीरे से कबीर का बटन खोला। वो गर्म, तनाव से भरा हुआ था। उसने उसे सहलाया — जैसे कोई लेखक किसी वाक्य के अंत में विराम लगाने से पहले ठहराव ले। कबीर एकदम स्तब्ध हो गया। अदिति नीचे झुकी, और उसने अपने होंठ उस पर रख दिए — पहले एक कोमल स्पर्श, फिर एक लयबद्ध गति, जैसे कोई नृत्य का एक जटिल स्टेप।

वो उसे अपनी सांसों में समेट चुकी थी — एक नियंत्रित उत्तेजना, हल्की कराहट, और कबीर के हाथों का उसके बालों में उलझना।

कुछ पल बाद, कबीर ने उसे उठाया — अब उसकी बारी थी।

उसने धीरे-धीरे उसकी साड़ी की परतें खोलीं — और अदिति का शरीर, ठंडे कोहरे में भी एक गर्म, सुनहरी कहानी की तरह प्रकट होता चला गया।

वो झुका, और उसकी गर्दन, कंधे, स्तन, और जांघों को चुंबनों से नमस्कार करता गया — जैसे कोई पाठक किसी पुस्तक के हर अध्याय को पढ़ता है।

उसकी जीभ अब नीचे पहुँची — और फिर उसने उसकी योनि को चूमा।

अदिति का शरीर एक झटके में अकड़ गया। उसकी आँखें बंद थीं, मुट्ठियाँ भींची हुईं, और एक लंबी, दबी हुई कराह निकल गई।

वो वहाँ देर तक रहा — जैसे कोई शोधकर्ता किसी रहस्य को सुलझा रहा हो।

“अब मेरे भीतर आओ…” अदिति की आवाज़ एक फुसफुसाहट थी, जो हवा में घुल गई।

कबीर ने खुद को उसकी योनि में धीरे-धीरे उतारा —

पहला प्रवेश एक नई कहानी का पहला वाक्य था,

दूसरा उसका पहला मोड़।

हर थ्रस्ट एक नया पैराग्राफ रचता।

कबीर की गति एक लय में थी, और अदिति उसके नीचे एक खुली किताब की तरह पन्ने पलट रही थी।

उसका चरम पहले आया — एक मूक चीख, गर्दन का तनाव, और पूरे शरीर में एक लंबा, सुखद कंपन।

कबीर ने गति तेज की, कुछ और ज़ोरदार धक्कों के बाद उसने अदिति को और ज़ोर से अपने सीने से लगा लिया —

और वहीं अपनी सारी भावना, सारा अनकहा प्रेम, अपना वीर्य उसके भीतर छोड़ दिया।

कुछ देर बाद दोनो चुपचाप एक-दूसरे से लिपटे हुए लेटे रहे — साँसें अब शांत, त्वचा पर चमक, और आँखों में एक नई चमक।

फिर उन्होंने कपड़े पहने।

अदिति ने अपनी साड़ी समेटी, कबीर ने अपना स्वेटर संभाला।

“अब?” अदिति ने पूछा।

“अब… शुरुआत करो,” उसने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हारी अगली मुद्रा का इंतज़ार है।”

दोनो तैयार हुए — और फिर हाथों में हाथ डालकर बालकनी से नीचे उतरे। इस बार अदिति की मुद्राओं में और भी जान थी… और कबीर की नज़रों में, एक नया विश्वास।

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